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Sunday, January 29, 2017

संडे की लाचारी

सुबह की मध्यम थी पुरवाई
वो, इतवार की थी पहली अंगड़ाई
पलके अभी नहीं खुली थी पूरी
अखियों में अब भी कुछ नींद समाई थी
हम सोये से अधजगे से करवटे बदले पड़े थे
तन कहता कुछ देर और जरा
सोलेने दो, समझो तो कुछ मेरी व्यथा
मन की माने तो उठ जा
अभी करने को है कितना काम पड़ा
कुछ गंदे है कुछ गीले है
कपड़े अब भी वैसे ही पड़े है
इन्हीं उधेड़ बुन में था मैं पड़ा
तब तक घंटी बजी दरवाजे पे था कोई खड़ा
कुक अब आ गई थी
मेरे हर उम्मीदों पे पानी फेरने
अब सब छोड़ ये था सोचना
आज खाने में क्या है बनना

Saturday, June 25, 2016

आज मेरे जन्म दिन के अवसर पर


साल के एक – एक दिन को
दहलीज की तरह पार करते हुये
आज उम्र के इस पड़ाव तक भी आगया
बहुत सी अच्छी – बुरी यादों को दिल में सजोये
बचपन की चंचल बदमासियो से
किशोरावस्था की मस्तियो से होता हुआ
आज कर्मभूमि में अडिग बढ़ रहा मैं
तमाम सफलतावो – असफलतावो को साथ लिए
माँ – बापू के आशावो का पियूष
आज उनसे दूर जी रहा है उनके लिए
बड़ो का आशीर्वाद है जहाँ सर पर
छोटो का प्यार दिल में लिए
जीवनसंगनी और नन्हे पियूष ने
इन अधरों पे मुस्कान दिए
दोस्त सभी अनमोल उपहार
इस कलयूग में भी करते इतना प्यार
सब विधि का विधान हैं
पूर्वलिखित परमेश्वर द्वारा
ये उनका ही संसार हैं
हर मुझसे बड़े से हाथ जोड़ अनुरोध हैं
ऐसे ही आशीर्वाद बनाये रखना
छोटो से कहना है स्नेह सजोये रखना
और, जो हमउम्र साथी हैं सब साथ निभाए चलना
माँ – बापू, ईस्वर के बाद
दीदी – जीजा, चाचा – चाची
बुया – फूफा, भईया – भाभी
मामा – मामी, दादी और मौसी
मुझे सबकी अभी भी जरुरत हैं
इतना बड़ा नहीं हुआ अभी मैं
कि बिन आप के आशीर्वादो के
एक पग भी चल पाउगा
आप सबका नन्हा दीपू
आप के प्यार से ही मुस्काऊगा

Wednesday, June 22, 2016

कब आवोगी तुम मिलने मुझसे

दिल की प्यास बहुत हैं
मन में आस बहुत हैं
कब आवोगी तुम सजनी
मिलने मुझसे
हर एक दिन एक साल हो जैसे
आजावो की अब चैन नहीं हैं
दिल मेरा वही
अब बेचैन बहुत हैं
कब आवो गी सजनी
तुम मिलने मुझसे
कह दो की प्यार बहुत है
प्रिये तुमसे मिलने को
ये दिल बेताब बहुत हैं
इन आँखो से बहती
अंश्रु धारा
मन तुम बिन बेचैन बहुत है
जल्दी होगा मिलान हमारा
अब ये दुरी मुझ पे भी भारी है
मैं आउ गी साजन
जल्दी ही तुमसे मिलने
प्राण प्रिये अब क्या बोलू मैं अपनी पीड़ा
हर पल पल पल बस तुमको ही ढूढे मेरे नैना
मैं तुमसे दूर बहुत हूँ
समझो कितना मैं मजबूर बहुत हूँ
तुम जीवन संगनी मेरी
समझो मेरी व्यथा पुरानी
कब आवो गी सजनी
तुम मिलने मुझसे
कब होगी तुम पास हमारे

Friday, June 10, 2016

अभी मुझमे बचपना है बाकि


जिंदिगी पर नजर रखी हमने
हर पल की खबर रखी हमने
पर फिर भी न जाने कैसे
जिंदगी ने बचपन चुरा लिया हमसे
अभी चार दिन पहले की ही तो बात है
मदमस्त हम अपने बचपन के साथ थे
पंछियों से थी दोस्ती,
बारिसो की कुछ अलग बात थी
किसी की बात हम सुनते कहाँ
और किसी को कुछ कहने की जरुरत कहाँ
पर अचनक गई या होले – होले
बचपन न जाने कहाँ खो गई, शायद
जिंदगी को जितने की होड़ में
कुछ इतना आगे निकल आये
न बचपन रहा न मासूमियत
अब चेहरा बस खौफ से भरा
पर एक बात आज भी है बाकि
बचपन की हर याद है ताजी
जिंदगी ने बचपन छीन लिया तो क्या
अभी मुझमे बचपना है बाकि......

Friday, May 20, 2016

कोई नाम नहीं, बदनाम सही


कोई नाम नहीं
बदनाम सही
शुक्र है कम से कम गुमनाम नहीं
मय की गलियों में ही सही
अपनी एक पहचान तो है
समाज में अनजान तो नहीं
माना की ऊँचे तबके में जा नहीं सकता
पर उनको भी इन्ही रास्तो पे आते देखा
मैले है कपड़े पर इमान साफ़ रखता हूँ
उन सफ़ेद पोसो को भी
पल में इमान बदलते देखा
दो रोटी में पेट भर जाते यहाँ
चांदी की थाली वोलोको भी भूख से बिलखते देखा
नहीं है कोठे तो न सही
कम से कम आखो में नीद तो है
पैसे से भरी नहीं फटी जेब ही सही
कोई नाम नहीं, बदनाम ही सही

Saturday, April 2, 2016

मुझे हारना नहीं आया



रात में जगना नहीं आया
सुबह सोना नहीं आया
मुसीबतों के देख सामने रोना नहीं आया
आंधिया कितनी भी तेज भले रही हो
घुटनों पे बैठ आखों को ढकना नहीं आया
बिजलिया जहाँ कहर गिराती बार बार
मैंने भी आशिया बनाया वहीँ हर बार
नियति ने जितने भी शूल दिए
मजबूत हुआ मैं उतना है हर बार
अब तक,
विधि मुझसे जीत नहीं पाया
और,
मुझे उससे हारना नहीं आया

 
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