WELCOME TO PIYUSH'S BLOG :)

rss

Wednesday, April 29, 2015

हम प्यार करने लगे है

हमारे ख्यालात अब मिलने लगे है
आँखे अब दोनों के रात जगने लगे है
दूरिया अब नजदीकियों में बदल रही है
प्यार के अंकुर अब पनपने लगे है
कुछ शरारती ये निगाहे हो चली है, और
हमभी शरारत कुछ करने लगे है
मैं तुम्हे देख कर मुस्कुराने लगा हूँ
तुम मुझे देख शर्माने लगी हो
तुम्हारी खामोशिया अब समझ आने लगी है
तुम भी मेरे नाम पर इतराने लगी हो
मेरी हर धड़कन तुम्हारे नाम से गुजती है
तुम्हारी आरजुएं मेरा नाम गाने लगी है
अब बाकी रह गया कहाँ कुछ
दिल हमारा एक दूसरे का होने लगा है
तुम मुझे समझने लगी हो
मैं तुम्हे समझने लगा हूँ

Thursday, April 23, 2015

जान अभी बाकि है

इक आसु है अंगोरो की
कुछ मरी हुई आरजुएं है
सोये हुए एहसास की झाकी है
अभी सीने में साँस बाकि है
हौसलों की बुनियाद अब गिरी नहीं
अभी जेहन में आग बाकि है
मैं उजड़े गुलिस्ता का रखवाला हूँ
अभी सावन की फुहार बाकी है
सब रूठ चुक मुझसे
मैं हार चूका सबसे
पंखो में जोश अभी बाकी हैं
गिरा सके कोई आंधी मुझे कहाँ
मेरी हिम्मत में अभी जान बाकी है 

Wednesday, November 13, 2013

मौन है शब्द

आज मौन है शब्द
लिखने को भी कुछ बच नहीं
लगता है कुछ इस तरह
शारीर में आत्मा भी रहा नहीं
न कोई मंज़िल नजर आरही
मुड़ने को भी कोई मोड़ दिखा नहीं
आज शांत हो गया ये मन
कोई सोच भी आता नही
कुछ एक वेदनाएं है
पर साफ़ नजर आता नहीं
सांसो में कुछ उतार चढ़व से है
पर उखड जाये ऐसा लगता नहीं
मेरी डोर अब किधर लिए जारही
हवावो का इरादा समझ पा रहा नहीं
बस उही बस इसी तरह
क्या है और क्या नहीं

Friday, October 18, 2013

मुझे रोना नहीं आया

तुम्हे हंसना नहीं आया
मुझे रोना नहीं आया
मोहब्बत के समुन्दर में डूब
गोते लगाना नहीं आया
ख्वाबो की उड़ने तो बहुत उड़ी हमने
कुचल हिरनी सा भरना नहीं आया
थके - हारे गिरते - पड़ते बढ़ते रहे यू ही
बैसाखियों का ले सहारा चलना नहीं आया
छु न सके गम का साया भी तुम्हे, पर
मेरी आगोस में सिमट तुम्हे चलना नहीं आया
मुझे जीना नहीं आया, और
प्यार में गिर कर तुम्हे मरना नहीं आया

Thursday, September 12, 2013

न रहे बाकि कोई निशां

मुझे अपने गम पर न हसना आया न रोना
आसुओं के इस भवर में न आया कोई सपना सलोना
जाने क्या लिखा है माथे की इन लकीरों में
तार तार हो गया इतने जख्म लगे है सीने में
इक प्यार भरा दिल ही तो माँगा था
वो भी न हुआ इस ज़माने को गवारा
अकेला ही बढ़ रहा हूँ वक्त के साथ
लड़ा हूँ आज तक आगे भी लडूँगा
जबतक है उखड़ न जाये आखरी साँस
जाने रहे न रहे बाकि कोई निशां मेरे जाने के बाद

Saturday, August 31, 2013

मैं कुवारा हूँ, आज भी तुम्हारा हूँ

मैं कुवारा हूँ, आज भी तुम्हारा हूँ
पतंग की मदमाती उड़ान की तरह
समुन्दर के लहरो में आये उफान की तरह
हर बधावो को तोड़
आज भी तुम्हारे इंतज़ार में हूँ
उचाईयों से अब नहीं डरता मैं
हिरनी सा कुचाल भरता मैं
सबकुछ अब पीछे छोड़ आया
बड़े मुददत के बाद तेरी यादो को दिल में सजाया हूँ
चलते चलते दूर बहुत आ निकला
अब तो लगता है परछाई भी साथ छोड़ देगी
मुक्कदर ही बता सकती है अब कहाँ जा रहा हूँ
कुछ अंदेशा सा है शायद तुम्हारे पास आरहा हूँ
मेरी कस्ती डगमगा जाती हैं
मौत भी आकर गुजर जाती हैं
लोग हँसते है हँसाते हैं
पर मुझे तो सभी रुलाते हैं
अब कुछ भी करने को मन नहीं करता हैं
जाने किस बात से अब ये डरता हैं
हजारो की इस भीड़ में मैं खो गया हूँ
सच कहता हूँ तुम्हारे बिन मैं अकेला हो गया हूँ

Wednesday, July 24, 2013

आप को देखकर दिल में ये ख्याल आया

इस बार तो आपने कुछ कहर सा ढा दिया 
यू कहे तो आपने आसमा को ज़मी पर ला दिया
कौन कहता है कि  चाँद बस आसमा में ही दिखेगा  
एक नज़र कोई आप पर भी डाले 
सर उठाना छोड़ देगा 
आप के हुस्न की तारीफ़ में क्या कहु 
देख ले बादल भी जो आप को गरजना छोड़ देगा 
आखों में चमक होठो पर वो मुस्कान 
गर देख ले खुदा भी जो आप को 
खुदाई छोड़ देगा 
आचल को आप ने यू हवा में जो लहराया 
फ़िज़ावो ने एक नया गीत गाया 
कुछ सितारे जो टाक दू आप के आचल में 
फिर सारी कायनात ही आप को देख कर जाये सरमा
आप से मिल कर कुछ नया करने को मन चाहा
आप को देखकर दिल में ये ख्याल आया

Saturday, June 29, 2013

बदले हालत में बदलता मैं

हर कोई मेरा दिल दुखाने में लगा हैं
ये ज़माना मुझपर मुस्कुराने में लगा हैं
ये तन्हायी ये बेचैनीया अब जीने नहीं देती मुझे
और खुदा है जो मुझे मनाने में लगा है
हर रोज न जाने जहर का कितने जाम पी  जाता हूँ मैं
और शाखी है की अमृत पिलाने में लगा हैं
तमाम ख्वाहिसो और खुशियों को दफ़न कर आया
और चंडाल है की कब्र से ताबूत निकालें में लगा है
अपने गमो को हमसाथी बनाना सीख लिया हमने
और गम है की नये दोस्त बनाने में लगा है
न उमंग न तरंग है अब कोई बाकी
और फिजाये है की नए धुन बनाने में लगा है
अब मंजिल नहीं कोई हर राह बंद हो गई है
पर मुकद्दर है कि नए मोड़ बनाने में लगा है
हर कोई बदल गया इस जमाने की बदल में
हार ही गया हूँ अपने ही किये हुए पहल में
और बदकिस्मती है की मुझे फिर नए रूप में ला
इस बदले ज़माने से लड़ाने में लगा है .........

Wednesday, March 27, 2013

न मैं रहूगा न मेरी याद

एक रोज सो जाऊ गा मै 
फिर न आँखे नम होगी 
फिर न रोऊ गा मैं 
फिर न तेरी याद होगी 
न होगी मेरी तन्हाई 
फिर न होउगा कभी मैं अकेला 
और न होगी मेरी आवाज कोई 
न होगे होठ ये मेरे 
न इन पर तुम्हारा नाम होगा 
फिर न कभी मेरे मन को ठेस लगे गी 
फिर न मेरे दिल में दर्द होगा 
और न होगा उदास कभी
फिर न मेरे अधरों पर कोई मुस्कान होगी 
और न ही होगा एहसास कोई
फिर न कोई चाहत होगी 
और न ही कोई लालसा 
फिर कभी न भूख होगी
और होगी न कोई प्यास 
बस रहे गा ये नस्वर शरीर 
जिसे भी तुम राख कर दोगे 
और फिर उसके बाद 
न मैं रहूगा न मेरी याद 

कैसे समझाऊ कैसे बतलाऊ

रातो के नीद मेरी हराम करके 
वो चैन से सोते है 
उनकी होठो पर हँसी हमेशा 
और हम अक्सर ही रोते है
खुले गगन के नीचे वो 
मस्त मौला से रहती है 
मैं आवारा मैं बंजारा 
मन उसकी ही धुन में रहता है 
कैसे समझाऊ कैसे बतलाऊ 
ये दिल प्यार उन्ही को करता है 
 
Entertainment Top Blogs A1 Web Links -