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Saturday, August 31, 2013

मैं कुवारा हूँ, आज भी तुम्हारा हूँ

मैं कुवारा हूँ, आज भी तुम्हारा हूँ
पतंग की मदमाती उड़ान की तरह
समुन्दर के लहरो में आये उफान की तरह
हर बधावो को तोड़
आज भी तुम्हारे इंतज़ार में हूँ
उचाईयों से अब नहीं डरता मैं
हिरनी सा कुचाल भरता मैं
सबकुछ अब पीछे छोड़ आया
बड़े मुददत के बाद तेरी यादो को दिल में सजाया हूँ
चलते चलते दूर बहुत आ निकला
अब तो लगता है परछाई भी साथ छोड़ देगी
मुक्कदर ही बता सकती है अब कहाँ जा रहा हूँ
कुछ अंदेशा सा है शायद तुम्हारे पास आरहा हूँ
मेरी कस्ती डगमगा जाती हैं
मौत भी आकर गुजर जाती हैं
लोग हँसते है हँसाते हैं
पर मुझे तो सभी रुलाते हैं
अब कुछ भी करने को मन नहीं करता हैं
जाने किस बात से अब ये डरता हैं
हजारो की इस भीड़ में मैं खो गया हूँ
सच कहता हूँ तुम्हारे बिन मैं अकेला हो गया हूँ

Wednesday, March 27, 2013

न मैं रहूगा न मेरी याद

एक रोज सो जाऊ गा मै 
फिर न आँखे नम होगी 
फिर न रोऊ गा मैं 
फिर न तेरी याद होगी 
न होगी मेरी तन्हाई 
फिर न होउगा कभी मैं अकेला 
और न होगी मेरी आवाज कोई 
न होगे होठ ये मेरे 
न इन पर तुम्हारा नाम होगा 
फिर न कभी मेरे मन को ठेस लगे गी 
फिर न मेरे दिल में दर्द होगा 
और न होगा उदास कभी
फिर न मेरे अधरों पर कोई मुस्कान होगी 
और न ही होगा एहसास कोई
फिर न कोई चाहत होगी 
और न ही कोई लालसा 
फिर कभी न भूख होगी
और होगी न कोई प्यास 
बस रहे गा ये नस्वर शरीर 
जिसे भी तुम राख कर दोगे 
और फिर उसके बाद 
न मैं रहूगा न मेरी याद 

कैसे समझाऊ कैसे बतलाऊ

रातो के नीद मेरी हराम करके 
वो चैन से सोते है 
उनकी होठो पर हँसी हमेशा 
और हम अक्सर ही रोते है
खुले गगन के नीचे वो 
मस्त मौला से रहती है 
मैं आवारा मैं बंजारा 
मन उसकी ही धुन में रहता है 
कैसे समझाऊ कैसे बतलाऊ 
ये दिल प्यार उन्ही को करता है 

Saturday, March 23, 2013

मोहब्बत के गलियारे में


मोहब्बत के उस गलियारे में 
एक पेड़ हमने भी लगाया था 
अरमानो की खाद डाली 
उम्मीदों से नहलाया था 
दुनिया के धुल और धुएं से 
बचाने की हर कोशीस करी हमने 
सूरज की तपिश को खुद पर झेल था 
ये चाहत लिए फले का फुले गा 
और छाव  देगा सभी को 
पर विडम्बना कुछ ऐसी हो गई 
नजाने क्यू 
लगाया था पेड़ आम का 
वो बबूल कैसे हो गया 

Friday, March 22, 2013

तेरा इंतजार करते है

मोहब्बत में दो आसू हमने भी गिराए है 
वफ़ा की राह में पैरो में काटे चुभाये है 
पटक दिया सर पत्थर  पर , कि 
जनाजा निकल जाये 
पर रहम उस पत्थर को भी आ गया 
उसने भी बक्श दिया मुझे 
शायाद ये सोचा कर 
की पिघल जाये वो कठोर दिल भी कभी 
पर न वो पत्थर दिल पिघली न पिघल उसका मन 
और हम रोते रह गए जबकि आसू भी हो गए ख़तम 
पर न हुआ कम उसका सितम 
अब तो बस जिए जा रहे है 
बची हुयी जिंदगी को अपने 
और बस इंतजार है 

Tuesday, March 19, 2013

मेरी खामोसी तेरी याद

हर आहट पर तेरा इंतजार होता है 
झनकती है जब कोई पायल 
लगता है की तुम होगी  
हटती है जब कड़ी दरवाजे की 
दिल बेचैन हो उठता है 
कही तुम तो नहीं 
पर हर आहट हर झंकार के बाद
हर बार दवाजा खुलने के बाद 
फिर वही खामोसी थी 
फिर वैसे ही दिल उदास 
क्यू कि इस बार भी तुम दूर थी 
नहीं थी तुम पास नहीं थी तुम पास 

Monday, March 11, 2013

फिर जिंदगी एक बार



फिर कुछ दिल ने कहा 
फिर तेरी याद आगई
मौसम ए बहार फिर इक बार 
दिल को मायूस कर गई 
हमने तो नदियों सा 
बहना सीख ही लिया था , पर
फिर जिंदगी एक बार 
समंदर की लहरों की तरह 
चटान से टकरा गई 

Sunday, March 3, 2013

मैं मुसकुरने चला था

सब कुछ खो गया वो जो मैं पाने चला था 
भूल गया हर शब्द उन तरानों के जो मैं गाने चला था 
आँखो  पर सजा लिए उन भावनावो को बना के मोती 
जिन्हें आपने होठों से मुस्कुराने चला था 
मुझे हर उस रास्ते ने ठोकर ही दिया 
जिन पर चल कर मैं मंज़िल बनाने चला था 
मेरी बेदाग तम्नावो ने मुझे जमी पर ला पटका 
जिनकी पतंग बना मैं आसमा में उड़ाने चला था 
अब तो उन दर्द को भी दर्द होने लगा है 
जिन पर मैं मरहम लगाने चला था 
सो गई हर ख्वाहिशे लेकर जहर का एक प्याला 
जिन ख्वाहिशो को लेकर मैं अपनी जिंदगी सजाने चला था 
विधि ने बस ठोकरे ही ठोकरे दी है मेरे नसीब में 
मैं भूल इस बात को हँसने - हँसाने चला था मैं मुसकुरने चला था 

Friday, March 1, 2013

कोई नाम मिल जाये

मेरी खवाहिसो को कोई सौगात मिल जाये 

तेरे होठो से कोई पैगाम मिल जाये


अभी तो बेआबरू ही जिए जा रहे है


तू समझ ले अगर दिल लगा के इसे 


तो मेरी मोहब्बत को भी कोई नाम मिल जाये

Sunday, December 23, 2012

आ गए हम कहाँ


जिंदगी के उतार चढावो में
गिरते संभलते हम आ गए कहाँ
बचपन की उस गोद से
माँ के आचल की छाव से
पापा के फटकार से
बाबा के प्यार से
दादी के लोरियों से
आ गए हम कहाँ
जब कोई गम न था
जब हम में हम न था
हर पेड़ पौधे  जब दोस्त थे
गली का हर कुत्ता रखवाला था
निकल कर उस समय से
आ गए हम कहाँ
जब सब को परेशान करना
कोने में छुप कर गेंद के लिए रोना
पेन्सिल को खा के पेट भरना
टिफिन में मिले लडू को चुपके से
खाने की जो आदत थी
उन आदतों को कहाँ भूल आये हम
वो बचपन वो झूले वो लोरी
वो मासूमियत वो हसना वो रोना
कहाँ छोर आये हम
कब भूले वो सब पता भी न चला
समय का पहिया कुछ ऐसा चला

Monday, June 25, 2012

ये ख्याल आया है

मन में ये ख्याल आया है
मेरी खयालो में कोई शाया है
पहचान उसकी छुपी है
पर लगता है कुछ यूँ कि
उसने बरसो से साथ निभाया है
उसके सूरत से अनजान हूँ पर
उसके आहट का मुझ पर सरमाया है
बैठे - बैठे जाने कैसे बस यूँ ही
ये ख्याल आया है 

तुम पास भी और दूर थी

जिंदगी इक तलाश थी तुझ से मिनले की प्यास थी 
मिला जब भी तुझसे तू हर बार एक सवाल थी
मेरे अधरों की प्यास क्या बुझती, जब
मेरे सिने में धधगती आग थी
आसू बह रहे थे अंतर मन से
पर होठो पर मुस्कान थी
मंजिल बहुत दूर और राह भी मजबूर थी
मै खोजता तुम्हारा साथ 
तुम पास भी और दूर थी
अकेला ही बढ़ता रहा मै
हर मोड़ पर तुमसे मिलने की आस थी
तुम पास भी और दूर थी

Tuesday, December 13, 2011

Teri Panah Khojta Hai Man

काम करते करते जब थक जाता है मन
तब तेरी पनाह खोजता है मन
माना अभी हम दूर है 
हालातो से मजबूर है 
फिर भी याद तो तेरी आती है
तेरी बाते मुझे सताती है 
जिन हाथो को थामे तुम
हौले से मुस्काती थी
वो हाथ तेरे हाथो की
छुवन महसूस अभी भी करते है
तेरी बदन की भीनी खुसबू
अब तक मेरे सासों में फैली है
अब भी रातो में तेरी नाजुक आहट
साफ सुनाई देती है
बंद कमरे में बैठ अकेले
अक्सर नैन नीर बहाते है
फिर जब थक जाता है मन
तब तेरी पनाह खोजता है मन
 
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